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Tuesday, January 8, 2013

2005 में जूवेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन एक्ट में संशोधन किया गया था..

2005 में जूवेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन एक्ट में संशोधन किया गया था। अगर कोई शख्स 18 साल से कम है तो उसे बच्चा ही कहा जाएगा। ऐसे मामलों में अपराधी की पहचान गुप्त रखी जाती है और मामला जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड को भेजा जाता है। इसके पीछे मकसद यह है कि नाबालिग को सुधारा जाए। उसे सुधार गृह में भेजा जाता है। सजा देने के बदले जूवेनाइल को सुधारने का प्रावधान है।

मेडिकल बोर्ड अगर उम्र का एक्जेक्ट निर्धारण नहीं कर पाता है तो जेजे बोर्ड को यह पावर है कि वह कारण बताते हुए उसकी उम्र एक साल कम मान सकता है..

दिल्ली जूवेनाइल जस्टिस रूल 2009 के नियम 12 में उम्र तय करने की प्रक्रिया बताई गई है और उसी हिसाब से इस आरोपी की उम्र भी मानी जाएगी। नियम के मुताबिक पहले स्कूल के सर्टिफिकेट में जो उम्र है वही मानी जाएगी। अगर यह सर्टिफिकेट नहीं है तो म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन या पंचायत जो बर्थ सर्टिफिकेट देती है वह माना जाएगा। अगर यह भी नहीं है तब मैट्रिक सर्टिफिकेट के हिसाब से उम्र मानी जाएगी। अगर इन तीनों में से कुछ भी नहीं है सिर्फ तभी मेडिकल बोर्ड गठित किया जाएगा. मेडिकल बोर्ड जब एज तय करता है तो वह एक तय एज नहीं देता है बल्कि रेंज में बताता है। जैसे 17 से 19 साल या 18 से 20 साल.

जुवेनाइल कानून

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के गाइडलाइंस के मुताबिक 18 साल से कम के आरोपी को 'सजा' नहीं दी जाती बल्कि उसका 'सुधार' किया जाता है। ये गाइडलाइंस यूएन कन्वेंशन ऑफ राइट्स ऑफ चाइल्ड द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप बनाए गए हैं। अब जुवेनाइल कानून को बदलने की मांग की जा रही है. मांग है कि जुवेनाइल उम्र को घटा कर 18 से 16 कर दिया जाए। सन् 2000 में यह उम्र 16 साल ही थी, जिसे संशोधित करके 18 कर दिया गया था। अब अगर इसे फिर से संशोधित कर दिया जाए तो भी यह इस केस के नाबालिग आरोपी पर लागू नहीं हो पाएगा क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 (1) के मुताबिक, जब अपराध होता हो तो उस वक्त जो कानून है, उसी के तहत ही सजा सुनाई जा सकती है। इस अनुच्छेद में परिवर्तन के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना होगा, जिसके लिए संसद में दो तिहाई बहुमत अनिवार्य है।