पिता के कहने पर मूलशंकर(स्वामी दयानन्द सरस्वती) ने एक बार शिवरात्रि का व्रत रखा. लेकिन जब उन्होंने देखा कि एक चुहिया शिवलिंग पर चढ़कर नैवेद्य खा रही है, तो उन्हें आश्चर्य हुआ और धक्का भी लगा. उसी क्षण से उनका मूर्तिपूजा पर से विश्वास उठ गया.अपनी शादी की तैयारी बारे में जानकार उन्हें दुःख हुआ और वे घर से भाग निकले . सर मुंडा लिया एवं गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया .
Showing posts with label दयानन्द सरस्वती. Show all posts
Showing posts with label दयानन्द सरस्वती. Show all posts
Wednesday, August 15, 2012
‘पाखण्ड खण्डिनी पताका’
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती,गृह त्याग के बाद मथुरा में स्वामी विरजानंद के शिष्य बने. शिक्षा प्राप्त कर गुरु की आज्ञा से धर्म सुधार हेतु ‘पाखण्ड खण्डिनी पताका’ फहराई.
Subscribe to:
Posts (Atom)